अजमेर। विजयादशमी आते ही देश के कोने-कोने में रावण के विशाल पुतले अग्नि को समर्पित कर दिए जाते हैं। आकाश आतिशबाजी से जगमगा उठता है, दिशाएँ जय श्रीराम के उद्घोष से गूँजने लगती हैं और समूचा समाज असत्य पर सत्य तथा अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव मनाता है। किंतु इस उल्लास और उत्सवधर्मिता के बीच एक प्रश्न अंतर्मन को झकझोरता है—क्या रावण के पुतले के साथ हमारे भीतर पल रहा अहंकार भी जलता है? क्या हम अपनी वासनाओं, स्वार्थ, ईर्ष्या, प्रतिशोध और दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करने की प्रवृत्ति से मुक्त हो पाते हैं? यदि नहीं, तो रावण दहन की सदियों पुरानी परंपरा निभाने के बावजूद उसका वास्तविक संदेश हमारे जीवन में अधूरा रह जाता है। रावण को अग्नि के हवाले करना एक अनुष्ठान है, लेकिन अपने भीतर के रावण को पहचानकर उसका अंत करना जीवन की सबसे बड़ी साधना है।
रामायण केवल देवत्व, युद्ध और विजय की कथा नहीं है। यह मानवीय संवेदनाओं, पारिवारिक संबंधों, राजधर्म, नारी गरिमा, त्याग, कर्तव्य और अहंकार के पतन का ऐसा कालजयी महाकाव्य है, जिसमें प्रत्येक युग अपने प्रश्नों के उत्तर खोज सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हमें केवल आदर्शों के शिखर नहीं दिखाती, बल्कि उन कठिन परिस्थितियों से भी परिचित कराती है, जिनमें आदर्शों की वास्तविक परीक्षा होती है। श्रीराम का राजसुख त्याग, भरत का सत्ता से विरक्त रहकर राजकाज सँभालना और जनकनंदिनी सीता की असाधारण पीड़ा रामकथा को केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन और समाज के लिए निरंतर प्रासंगिक चिंतन बनाती है।
*राजमुकुट का त्याग : मर्यादा पुरुषोत्तम की महानता*
अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ चल रही थीं। राजमहल उत्सव के उल्लास से भरा था और प्रजा अपने प्रिय राजकुमार को राजा के रूप में देखने के लिए आतुर थी। किंतु नियति ने ऐसा मोड़ लिया कि राज्याभिषेक की मंगल बेला वनवास की घोषणा में बदल गई। महारानी कैकेयी के वरदानों के कारण श्रीराम को चौदह वर्ष वन में बिताने थे और राजसिंहासन भरत को सौंपा जाना था।यह वह निर्णायक क्षण था, जब सत्ता के लिए संघर्ष, विरोध अथवा विद्रोह की संभावनाएँ जन्म ले सकती थीं। श्रीराम चाहते तो अपने अधिकार का प्रश्न उठा सकते थे, लेकिन उन्होंने पिता के वचन और पारिवारिक मर्यादा को सर्वोपरि माना। राजमुकुट के स्थान पर वनवासी का वेश धारण कर उन्होंने सिद्ध किया कि महानता केवल अधिकार प्राप्त करने में नहीं, बल्कि किसी उच्चतर नैतिक मूल्य की रक्षा के लिए अपने अधिकार का त्याग करने में भी निहित होती है।
श्रीराम का वनगमन पलायन नहीं, मर्यादा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था। उन्होंने राजमहल के वैभव की तुलना में वचन की प्रतिष्ठा को महत्त्व दिया। सीता और लक्ष्मण ने भी उनके साथ वन जाने का निर्णय लिया। इस प्रकार राजमहल की सुख-सुविधाओं को पीछे छोड़कर तीनों ने कठिनाइयों से भरे जीवन का मार्ग चुना। यह प्रसंग आज भी एक महत्त्वपूर्ण कसौटी प्रस्तुत करता है। राजनीति हो, प्रशासन हो अथवा पारिवारिक जीवन पद और अधिकार का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उनके साथ कर्तव्य, नैतिकता और उत्तरदायित्व जुड़े हों। श्रीराम का चरित्र स्मरण कराता है कि सत्ता व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षा का साधन नहीं, बल्कि लोककल्याण और मर्यादा की रक्षा का माध्यम होनी चाहिए।
*भरत : राजसिंहासन से बड़ा भाई का सम्मान*
रामायण में भरत का चरित्र त्याग और नैतिकता की एक विलक्षण मिसाल है। उन्हें जब ज्ञात हुआ कि उनकी माता कैकेयी के कारण श्रीराम वनवास गए हैं और उनके लिए राजसिंहासन माँगा गया है, तो उन्होंने इस निर्णय को अपने लिए गौरव नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा का विषय माना।
भरत श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए वन पहुँचे। उन्होंने उनसे लौटकर राज्य सँभालने का आग्रह किया, किंतु श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा का पालन करने का अपना संकल्प नहीं बदला। तब भरत ने श्रीराम की चरण-पादुकाएँ सिंहासन पर स्थापित कीं और स्वयं को उनका प्रतिनिधि मानकर राजकाज सँभालने का निर्णय लिया। उन्होंने राजधर्म का निर्वाह किया, लेकिन राजसुख से दूरी बनाए रखी।यह प्रसंग भारतीय संस्कृति में सत्ता और सेवा के संबंध को एक नई ऊँचाई प्रदान करता है। भरत के लिए राजसिंहासन व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि दायित्व था। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी पद को प्राप्त कर लेना और उस पद की नैतिक गरिमा को बनाए रखना दो अलग-अलग बातें हैं।
आज जब अनेक बार पद, प्रतिष्ठा और अधिकार को व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में देखा जाता है, तब भरत का चरित्र याद दिलाता है कि सच्चा नेतृत्व दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने, जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करने और निजी स्वार्थ से ऊपर उठने में निहित है। भरत की महानता इस बात में नहीं थी कि उन्हें राजसत्ता मिल सकती थी, बल्कि इस बात में थी कि उन्होंने अपने भाई के अधिकार की रक्षा को अपने हित से ऊपर रखा।
*जनकनंदिनी सीता : वैभव से वनवास और अशोक वाटिका की वेदना तक*
रामायण का सबसे मार्मिक और संवेदनशील पक्ष जनकनंदिनी सीता का जीवन है। मिथिला के राजा जनक की दुलारी पुत्री, राजमहल के वैभव में पली-बढ़ी राजकुमारी और अयोध्या की महारानी बनने वाली सीता ने जीवन में ऐसे कष्ट सहे, जिनकी कल्पना मात्र से मन द्रवित हो उठता है।श्रीराम के वनगमन के समय सीता चाहतीं तो राजमहल की सुरक्षा और सुख-सुविधाओं के बीच रह सकती थीं। किंतु उन्होंने जीवनसाथी के साथ सुख-दुःख साझा करने का निर्णय लिया। राजसी परिधान, महलों का वैभव और सुरक्षित जीवन पीछे छूट गए। वन की कठिनाइयाँ, अनिश्चितता और अभाव उनके जीवन का हिस्सा बन गए। उन्होंने सुविधा के बजाय सहचर्य को चुना और यह संदेश दिया कि संबंधों की सार्थकता वैभव से नहीं, विश्वास, संवेदना और सहभागिता से निर्मित होती है।लेकिन वनवास की कठिनाइयाँ सीता की नियति का अंतिम अध्याय नहीं थीं। पंचवटी से रावण द्वारा छलपूर्वक उनका हरण किया गया और उन्हें लंका की अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा गया। अपने परिवार, पति और परिचित संसार से दूर सीता ने विरह, असुरक्षा और मानसिक पीड़ा के दिन बिताए। रावण के वैभवशाली महलों तथा प्रलोभनों के सामने भी उन्होंने अपने आत्मसम्मान और निष्ठा से समझौता नहीं किया।
सीता का चरित्र इस सत्य का उद्घोष करता है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को असहाय बना सकती हैं, किंतु उसकी आंतरिक शक्ति और आत्मसम्मान को पराजित करना सरल नहीं होता। अशोक वाटिका में सीता की प्रतीक्षा केवल श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा नहीं थी; वह अन्याय के सामने अपने स्वाभिमान और विश्वास को अक्षुण्ण रखने का संघर्ष भी थी। रावण-वध और अयोध्या वापसी के बाद भी सीता की पीड़ा का अंत नहीं हुआ। रामायण की विभिन्न परंपराओं तथा उत्तरकांड में वर्णित प्रसंगों के अनुसार, लोकापवाद के कारण उन्हें गर्भावस्था में वन में रहना पड़ा। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में उन्होंने लव-कुश का पालन-पोषण किया। यह प्रसंग रामकथा को एक गहरी मानवीय त्रासदी और नैतिक प्रश्न से जोड़ता है।
राजा जनक की दुलारी, जिसने पति के साथ वनवास स्वीकार किया, रावण की कैद सही और अपने आत्मसम्मान की रक्षा की, उसे अंततः सामाजिक संदेहों का भार भी उठाना पड़ा। यहाँ रामायण हमारे सामने एक गंभीर प्रश्न रखती है—क्या समाज की प्रतिष्ठा के नाम पर किसी स्त्री को बार-बार अपनी गरिमा सिद्ध करने के लिए विवश करना न्यायसंगत है? क्या लोकमत की रक्षा के लिए व्यक्ति की पीड़ा की उपेक्षा की जा सकती है? सीता का जीवन हमें धैर्य और निष्ठा की प्रेरणा अवश्य देता है, लेकिन साथ ही स्त्री की स्वतंत्रता, सम्मान और समान गरिमा पर विचार करने के लिए भी विवश करता है। आज जब महिलाओं को अनेक सामाजिक पूर्वाग्रहों और अनुचित अपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है, तब सीता की कथा का संदेश केवल सहनशीलता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसका एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि समाज स्त्री के आत्मसम्मान को स्वीकार करे और उसके प्रति न्यायपूर्ण दृष्टि अपनाए।
*रावण : ज्ञान और वैभव पर भारी पड़ा अहंकार*
रावण साधारण प्रतिद्वंद्वी नहीं था। वह विद्वान, शिवभक्त, शक्तिशाली शासक और स्वर्णमयी लंका का स्वामी था। उसके पास ज्ञान था, सामर्थ्य था और अपार वैभव भी। फिर भी उसका अंत हुआ, क्योंकि उसके व्यक्तित्व पर अहंकार ने विवेक को परास्त कर दिया था।
उसकी सबसे बड़ी त्रुटि यह थी कि उसने शक्ति को अधिकार और अपनी इच्छा को औचित्य मान लिया। सीता का हरण दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के अतिक्रमण का चरम उदाहरण था। विभीषण सहित शुभचिंतकों की सलाह की उपेक्षा करते हुए रावण अपने अहंकार में इतना डूब गया कि विनाश के संकेत भी उसे अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित नहीं कर सके।रावण का पतन इस शाश्वत सत्य को स्थापित करता है कि ज्ञान बिना विवेक के, शक्ति बिना संयम के और वैभव बिना नैतिकता के विनाशकारी हो सकते हैं। मनुष्य कितना भी सामर्थ्यवान क्यों न हो, यदि वह अपनी भूल स्वीकार करने का साहस खो देता है और दूसरों के अधिकारों का सम्मान नहीं करता, तो उसका अहंकार अंततः उसके पतन का कारण बन सकता है।
आज का रावण केवल दस सिरों वाला पुतला नहीं है। वह भ्रष्टाचार में दिखाई देता है, सत्ता के दुरुपयोग में दिखाई देता है, महिलाओं के प्रति अपराधों में दिखाई देता है, कमजोरों के शोषण में दिखाई देता है और उस मानसिकता में भी दिखाई देता है, जो अपनी सफलता को दूसरों का अपमान करने का अधिकार समझती है। जब पद मनुष्य को विनम्र बनाने के बजाय अहंकारी बना देता है, जब धन संवेदना के स्थान पर दंभ पैदा करता है और जब ज्ञान सहिष्णुता के बजाय दूसरों को तुच्छ समझने की प्रवृत्ति विकसित करता है, तब रावण का चरित्र हमारे समय में फिर जीवित हो उठता है।
*समकालीन समाज के लिए रामायण की प्रासंगिकता*
आज परिवारों में संवाद की कमी, संबंधों में बढ़ता स्वार्थ, सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का संकट और सामाजिक व्यवहार में असहिष्णुता अनेक चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसे समय में रामायण के आदर्शों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित रखना उसके व्यापक संदेश को संकुचित करना होगा।श्रीराम का त्याग कर्तव्य की प्रतिष्ठा सिखाता है। भरत का आचरण अधिकारों के प्रति सम्मान और सत्ता से अनासक्ति का संदेश देता है। लक्ष्मण की सेवा संबंधों में सहभागिता का मूल्य बताती है। सीता का जीवन आत्मसम्मान, धैर्य और नारी गरिमा के प्रश्नों को हमारे सामने रखता है। वहीं रावण का पतन चेतावनी देता है कि अहंकार अंततः मनुष्य की विवेकशक्ति को नष्ट कर सकता है।तकनीक और संचार के वर्तमान युग में मनुष्य पहले से अधिक जुड़ा हुआ है, लेकिन विचारों की असहमति को स्वीकार करने की क्षमता कई बार कमजोर पड़ जाती है। सोशल मीडिया पर अपमानजनक भाषा, बिना सत्यापन के आरोप, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति और अपनी बात को ही अंतिम सत्य मानने का आग्रह भी हमारे भीतर के अहंकार के आधुनिक रूप हैं।
रामायण की प्रासंगिकता इसी में है कि वह हमें दूसरों को बदलने से पहले अपने आचरण का परीक्षण करने की प्रेरणा देती है। वह सिखाती है कि सच्ची विजय किसी प्रतिद्वंद्वी को पराजित करने में ही नहीं, बल्कि अपने भीतर की दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करने में भी है।
*विजयादशमी : आत्मविजय का संकल्प*
विजयादशमी का वास्तविक संदेश केवल रावण-वध की स्मृति नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, विवेक और मर्यादा की स्थापना का संकल्प है। रावण का पुतला जलाना एक प्रतीक है; उसके पीछे निहित आत्मशुद्धि की भावना ही उसका सार है। यदि हम अपने अहंकार को विनम्रता से, स्वार्थ को सेवा से, छल को सत्य से, घृणा को करुणा से और अन्याय को न्यायपूर्ण आचरण से पराजित कर सकें, तभी विजयादशमी हमारे जीवन में सार्थक परिवर्तन ला सकेगी।रामायण यह भी समझाती है कि आदर्श जीवन की राह सरल नहीं होती। उसमें त्याग है, पीड़ा है, नैतिक दुविधाएँ हैं और ऐसे प्रश्न भी हैं, जिन पर प्रत्येक युग को गंभीरता से विचार करना पड़ता है। उसकी शाश्वतता किसी एक घटना की पुनरावृत्ति में नहीं, बल्कि हर पीढ़ी को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करने की क्षमता में निहित है।
आइए, इस विजयादशमी पर हम केवल रावण के पुतले का दहन न करें, बल्कि अपने भीतर के अहंकार को पहचानने और उसे पराजित करने का संकल्प भी लें। परिवार में प्रेम, समाज में संवेदना, सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और व्यवहार में विनम्रता को स्थान दें। दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें और अपनी शक्ति का उपयोग संरक्षण, सेवा तथा जनकल्याण के लिए करें।क्योंकि जिस दिन मनुष्य दूसरों पर विजय पाने की लालसा से ऊपर उठकर स्वयं पर विजय प्राप्त करना सीख जाएगा, उसी दिन रामराज्य की कल्पना केवल आदर्श वाक्य नहीं रहेगी, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के आचरण में साकार होने लगेगी।
रावण का दहन मैदान में होता है, लेकिन अहंकार का दहन अंतर्मन में। पहला उत्सव है, दूसरा साधना। और जिस दिन यह साधना हमारे जीवन का संस्कार बन जाएगी, उसी दिन विजयादशमी का वास्तविक अर्थ साकार होगा।
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*(लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधान सभा के माननीय अध्यक्ष हैं)*